परवाह




आख़िर क्यों परवाह करते हैं हम?


फ़ुरसत है इसलिए...?

या वक़्त रहते सोचना ज़रूरी सा लगता हैं?


भरोसा नहीं ऊपर वाले पे,

या यह इबादत ही है इसलिए?


कमजोर हैं इसलिए....?

या सामना करने की हिम्मत रखते हैं इसलिए?!


किस्मत का लिखा क्या पत्थर की लक़ीर है?

या नसीब अपना ख़ुद ही संजो सकते हैं हम?


सब कुछ तो है पास हमारे,

फिर भी कुछ ना कुछ कमी सी क्यों रहती है!


क्या लाए थे साथ जो ले जाएँगे यहाँ से?

फिर भी सामान बटोरते बटोरते नहीं थकते हम…


आख़िर क्यों परवाह करते हैं हम?


-नम्रता राठी सारडा (ड्रामा क्वीनः रीलोडेड)


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