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परवाह

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आख़िर क्यों परवाह करते हैं हम? फ़ुरसत है इसलिए...? या वक़्त रहते सोचना ज़रूरी सा लगता हैं? भरोसा नहीं ऊपर वाले पे, या यह इबादत ही है इसलिए? कमजोर हैं इसलिए....? या सामना करने की हिम्मत रखते हैं इसलिए?! किस्मत का लिखा क्या पत्थर की लक़ीर है? या नसीब अपना ख़ुद ही संजो सकते हैं हम? सब कुछ तो है पास हमारे, फिर भी कुछ ना कुछ कमी सी क्यों रहती है! क्या लाए थे साथ जो ले जाएँगे यहाँ से? फिर भी सामान बटोरते बटोरते नहीं थकते हम… आख़िर क्यों परवाह करते हैं हम? -नम्रता राठी सारडा (ड्रामा क्वीनः रीलोडेड) #dramaqueenreloaded #hindi #hindipoems #hindipoetry #Parwah #nams #hindikavita

मुस्कान उनकी

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  मुस्कान   उनकी कभी   माँ   से   एक   फुल्का   ज़्यादा   माँग   लो , तो   खिल   जाती   है   मुस्कान   उनकी ! फ़ोन   पर   कह   दो  -  माँ ,  घर   आ   रही   हूँ   छुट्टियों   में , तो   खिल   जाती   है   मुस्कान   उनकी ! दिन   में   दोबारा   वीडियो   कॉल   ही   कर   दो , तो   खिल   जाती   है   मुस्कान   उनकी ! पंद्रह   सेकंड   ज़्यादा   गले   लग   जाओ , तो   खिल   जाती   है   मुस्कान   उनकी ! माँ ,  आज   आपकी   बहुत   याद   आई …  इतना   ही   कह   दो , तो   खिल   जाती   है   मुस्कान   उनकी ! माँ ,  आज   मैं   बहुत   खुश   हूँ …  ये   सुनते   ही , खिल   जाती   है   मुस्कान   उनकी ! कितना   आसान   ह...

और वो खेल…

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घर - घर   खेलते   खेलते   कब   सपनों   के   घर   के   लिए  EMI  भरने   लगे , गुड्डे - गुड़ियों   से   खेलते   हुए   अब   अपने   बच्चों   को   बड़ा   करने   में   लग   गए। लुका - छिपी   के   खेल   में   ना   जाने   वो   फ़ुरसत   के   पल   कहाँ   छिप   गए , दिन - रात   गली   में   क्रिकेट   खेलने   वालों   के   लिए   अब  IPL  देखने   जितने   ही   पल   रह   गए। वो   पतंग   का   दौर   और   ज़ोर   से  ‘ वो  काट’  की   धूम , अब   तो   बस  laptop  के  virtual  वर्ल्ड   में   दिखता   है   ज़ूम !! कंचे   तो   मानो   सबसे   बड़ा   ख़ज़ाना   हुआ   करते   थे , अब   तो   बस   अगली   पीढ़ी   के...

वो चिट्ठी

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वो चिट्ठी और उसमे वो सूखे हुए लाल ग़ुलाब की पंखुड़ियाँ, आज अचानक हाथ लग गये, जब कपाट से वो पुराना बक्सा निकाला! कभी खिला करते थे… ग़ुलाब और अल्फ़ाज़ दोनों ही… आज सिर्फ़ तरसती यादें बन कर रह गए हैं! याद है मुझे उस दिन हल्क़ी सी बारिश हो रही थी, जब ये ग़ुलाब तुमने अपने बालों से निकाल के मुझे दिया था! तुमने कहा था… इसे मेरी याद समझ कर संजो कर रखना, मैं दोबारा अपने बालों में तुमसे ग़ुलाब लगवाने ज़रूर आऊँगी! उसके बाद कई मौसम आये और कई मौसम गये, पर मानो वो ग़ुलाबी लम्हा वहीं ठहर गया….! वो चिट्ठी आज भी उस ग़ुलाब की ख़ुशबू से महक रही है… बस कमी है तो…. तुम्हारे बालों की! -नम्रता सारडा (ड्रामा क्वीन - रीलोडेड)

चलो ना बाँटते हैं…

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चलो   ना   बाँटते   हैं पुरानी   यादें … बचपन   के   वो   क़िस्से , वो   अल्हड़्पन   के   ड्रामे ! वो   मम्मी   का   आँखें   दिखाना , वो   पापा   का   बचा   लेना …. चलो   ना   बाँटते   हैं ! चलो   ना   बाँटते   हैं   शरारती   यादें … साल   भर   वो   स्कूल   की   मस्तियाँ , वो   टीचरों   को   करना   तंग ! वो   टिफ़िन   ब्रेक   की   लज़ीज़   बातें , वो   घर   ना   जाने   का   मन …. चलो   ना   बाँटते   हैं ! चलो   ना   बाँटते   हैं मस्ती   भरी   यादें … गर्मियों   में   नानी   के   घर   का   वो   आमरस , वो   छुपन - छुपाई   के   झगड़े ! वो   रात   को   छत   पर   भूतों   की   कहानियाँ   सुनना , वो   भारी   भारी   बैग   भर ...